हड़प्पा संस्कृति

हड़प्पा संस्कृति





हड़प्पा सभ्यता / सिंधु घाटी सभ्यता :- 

प्राचीन भारत की पहली सभ्यता हड़प्पा सभ्यता हैयह संस्कृति पहली बार हड़प्पा नामक स्थान पर खोजी गई थी इसलिए उसी के नाम पर इस संस्कृति का नाम रखा गया हैहड़प्पा पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में मोंटगोमरी जिले की रावी नदी के बाएं तट पर स्थित हैलगभग 2600 और 1900 ईसा पूर्व के बीच इसका काल निर्धरण किया गया हैइस सभ्यता को सिंधु घाटी सभ्यता भी कहा जाता है 

इस सभ्यता का विस्तार प्रारंभ में 12 लाख 99 हजार 600 वर्ग K.M निर्धारित किया गया थाजो अब 15 – 20 लाख वर्ग K.M के आसपास संभावित हैसिंधु सभ्यता के लिए सुझाया गया नाम सिंधु सरस्वति संस्कृति एवं सिंधु सभ्यता का उपयुक्त नाम हडप्पा सभय्ता है 

सिंधु सभ्यता मे महादेवन एवं विश्वनाथ द्वारा किए गए शोध के आधार पर 2467 अभिलेख/ अभिलिखित सबूत मिले हैंजिसकी संख्या अब 3000 के आसपास हो गई है 

हड़प्पा संस्कृति काल / सिंधु घाटी सभ्यता :- 

 2600 से 1900 ईसा पूर्व 

हड़प्पा संस्कृति के भाग / चरण : 

  • ( i ) आरंभिक हड़प्पा संस्कृति 

  • ( ii ) विकसित हड़प्पा संस्कृति 

  • ( iii ) परवर्ती हड़प्पा संस्कृति 

B . C . ( Before Christ )ईसा पूर्व 

A . D ( Ano Dominy )ईसा मसीह के जन्म वर्ष 

B . P ( Before Present )आज से पहले 

हड़प्पा सभ्यता की खोज :- 

नोट :- हड़प्पा सभ्यता की खोज 1921-22 में दया राम साहनी , रखालदास बनर्जी और सर जॉन मार्शल के नेतृत्व में हुई 

1856 में जब कराची और लाहौर के बीच पहली बार रेलवे लाइन का निर्माण किया जा रहा था तो उत्खनन कार्य के दौरान अचानक हड़प्पा पुरास्थल मिलायह स्थान आधुनिक समय में पाकिस्तान में हैउन कर्मचारियों ने इसे खंडहर समझ लिया और यहां की हजारों ईंट उखाड़ कर यहां से ले गए और ईंटों का इस्तेमाल रेलवे लाइन बिछाने में किया गया लेकिन वह यह नहीं जान सके की यहां कोई सभ्यता थी 

उस समय जॉन व्रटन और विलियम व्रटन दोनो ने एक महत्वपूर्ण सभ्यता होने का संकेत दिया लेकिन फिर भी कोई उत्खनन नही किया गया 

 1920 – 21 में माधोस्वरूप वत्सदयाराम साहनी के द्वारा पहली बार हड़प्पा का उत्खनन किया गया 

1922 में रखाल दास बनर्जी ने मोहनजोदड़ो नामक स्थान का उत्खनन किया जो पाकिस्तान के सिंध क्षेत्र में लरकाना जिले में सिंधु नदी के दाएं तट पर स्थित हैरखाल दास बनर्जी इस टीले के ऊपर स्थित कुषाण युगीन , बौद्ध स्तुप का उत्खनन कर रहे थे 

नोट :- मोहनजोदडो का शाब्दिक अर्थ :-i ) मृतको का टीला ii ) मुर्दो का टीला iii ) प्रेतो का टीला iv ) सिंध का बाग v ) सिंध ना नक्लस्थान 

इन दोनों उत्खनन के बाद सन् 1924 में भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के डायरेक्टर जनरल सर जॉन मार्शल ने पूरे विश्व के सामने एक नई सभ्यता की खोज की घोषणा कीसर जॉन मार्शल ने लंदन वीकली नामक पत्रिका में इसे सिंधु सभ्यता नाम दिया 

 हड़प्पा सभ्यता को सिन्धुघाटी सभ्यता क्यों कहा जाता है ? :- 

 इस सभ्यता को सिन्धुघाटी सभ्यता इसलिए कहा जाता है क्योकि यह सभ्यता सिन्धु नदी घाटी के आसपास फैली हुई थीयह इलाका उपजाऊ था , हड़प्यावासी यहाँ पर खेती किया करते थे 

 सिंधु सभ्यता की लिपि :- 

 सिंधु लिपि को पढ़ने का प्रथम प्रयास 1925 में वेंडेल ने तथा नवीतम प्रयास नटवर झा , घनपत सिंह धान्या , राजाराम ने की थीलेकिन अभी तक भी सिंधु लिपि को प्रमाणित रूप से पढ़ा नही जा सकता है 

 लिपि के सबसे ज्यादा अक्षर मोहनजोदड़ो से तथा दूसरे नंबर पर हड़प्पा से मिले हैंलिपि के सबसे बड़े अक्षर धोलावीरा से मिले हैंजिन्हें Notice Board का प्रतीक माना गया है 

 सिंधु लिपि भावचित्रात्मक हैअर्थात चित्रो के माध्यम से भावो को अभिव्यक्त करनासिंधु लिपि दोनो ओर से लिखी जाती है इसलिए इसे बुस्ट्रोफेदेन कहा गया है 

 सिंधु सभ्यता के विभिन्न पक्षो को जानने की दृष्टि से विशेष उलेखनीय है : सेलखड़ी प्रस्तर एवं पक्की मिट्टी से निर्मित विभिन्न आकर और प्रकार की मोहरे जिनमे आयताकार और वर्गाकार प्रमुख हैं 

 आयताकार पर केवल लेख मिलते है जबकि वर्गाकार पर लेख और चित्र दोनो मिलते हैमेसोपोटामिया की 5 बेलनाकार मोहरे मोहनजोदड़ो से मिली है तथा फारस की बनी हुई संगमरमर की मोहरे लोथल से मिली है 

 सिंधु सभ्यता के निर्माता :- 

 सिंधु सभ्यता के अंतर्गत उत्खनन में मुख्य 4 प्रकार के अस्ति पंजर मिले हैं 

  • ( 1 ) प्रोटोआस्ट्रोलॉयड 

  • ( 2 ) भूमध्य सागरीय 

  • ( 3 ) अल्पाइन 

  • ( 4 ) मंगोलियन 

 इसके आधार पर यह सम्भावना स्वीकार की गई हैइसके निर्माण मे मित्रित प्रजातियों के लोगों का स्थान था वैसे तो इनका संस्थापक द्रविडा को माना गया हैजो बाद में दक्षिण भारत में पलायन कर गये 

 सिंधु सभ्यता की प्रमुख विशेषता :- 

कास्य युगीन सभ्यता थी 

भारतीय इतिहास में प्रथम नगरीय क्रंति का प्रतीक जिसकी पुष्टि उत्खनन से प्राप्त कई महत्वपूर्ण नगरो के अवशेषो से होती है 

व्यापारवाणिज्य गतिविधियों में महत्व 

जीवन के प्रति शांतिवादी दृष्टिकोण ( उत्खनन मेंतो हथियार , औजारही रक्षात्मक हथियार जैसे ढाल , कवच आदि । ) 

 जीवन के प्रति समिष्टवादी दृष्टिकोण ( इसकी पुष्टि मोहनजोदड़ो के विशाल स्नानागार , धोलावीरा एवं जूनीकरण से प्राप्त स्टेडियम , जूनिकरण एव मोहनजोदड़ो से प्राप्त सभा भवन ) 

 सैन्धव वासी लोग लोहे से परिचित नही थे उलेखनीय है कि लोहे का प्रचीनतम साक्ष्य/सबूत उत्तर प्रदेश के ऐटा जिला अतरंजीखेड़ा से मिला हैजिसका समय 1050 ई० पु० के आसपास स्वीकार किया गया है 

सिंधु वासी लोग पीतल से भी परिचित नही थे 

 हड़प्पा सभ्यता की जानकारी के प्रमुख स्रोत :- 

  • ( i ) आवास 

  • ( ii ) मृदभांड 

  • ( iii ) आभूषण 

  • ( iv ) औजार और 

  • ( v ) मुहरें 

  • ( vi ) इमारतें और खुदाई से मिले सिक्के 

 हड़प्पा सभ्यता के प्रमुख स्थल :- 

हड़प्पा सभ्यता के कुछ स्थल वर्तमान में पाकिस्तान में है और बाकी स्थल भारत में है :- 

  • नागेश्वर ( गुजरात ) 

  • बालाकोट ( पाकिस्तान ) 

  • चन्हुदड़ो ( पाकिस्तान ) 

  • कोटदीजी ( पाकिस्तान ) 

  • धौलावीरा ( गुजरात ) 

  • लोथल ( गुजरात ) 

  • कालीबंगन ( राजस्थान ) 

  • बनावली ( हरियाणा ) 

  • राखीगढ़ी ( हरियाणा ) 

 हड़प्पा सभ्यता में नगर नियोजन तथा वास्तुकल  

  • ( 1 ) नगर योजना 

  • ( 2 ) भवन निर्माण 

  • ( 3 ) सार्वजनिक भवन 

  • ( 4 ) विशाल स्नानघर 

  • ( 5 ) अन्न भंडार 

  • ( 6 ) जल निकास प्रणाली 

हड़प्पा सभ्यता की नगर योजना ( बस्तियाँ ) :- 

हड़प्पा सभ्यता की बस्तियाँ दो भागों में विभाजित थी 

( i ) दुर्ग :- ये कच्ची इंटों की चबूतरे पर बनी होती थी | दुर्ग को दीवारों से घेरा गया था | दुर्ग पर बनी संरचनाओं का प्रयोग संभवत : विशिष्ट सार्वजानिक प्रयोग के लिए किया जाता था 

( ii ) निचला शहर :- निचला शहर आवासीय भवनों के उदाहरण प्रस्तुत करता हैनिचला शहर भी दीवार से घेरा गया थाइसके अतिरिक्त कई भवनों को ऊँचे चबूतरों पर बनाया गया था जो नींव का कार्य करते थे 

 हड़प्पा सभ्यता की सडकों और गलियों की विशेषताएँ :- 

समकोण पर एकदूसरे को काटती हुई सीधी सड़के जिसके कारण पूरा नगर क्षेत्र विभिन्न आयातकार एव खण्डों मे विभक्त हो गया हैजिसे जाल पद्धति , ऑक्सफोर्ट पद्धति , चैस बोर्ड पद्धति कहते हैं 

सड़को का निर्माण मिट्टी से किया जाता था 

नोट :- बनावली में सड़कों पर गाड़ी के पहियो के निशान मिले हैंएवं सड़क को पक्की करने के प्रयास के भी साक्ष्य कालीबंगा से मिले हैं 

सड़क के किनारेकिनारे पानी निकासी के लिए नालियाँ बनी होती थी / नालियो को ढकने की व्यवस्या होती थीनालियो को फर्श से ढका जाता थानालियो मे थोड़ी दूर पर शोषक कूप होता या जिनमे गंदगी रुकती थीपक्की ईटो का प्रयोग बहुत अधिक मात्रा मे किया जाता था 

 हड़प्पा सभ्यता में भवन निर्माण :- 

हड़प्पा सभ्यता में माकानो की योजना आगन पर आधारित थीजिसमें शौचालय , स्नानागार , रसोईघर , सयनकक्ष आदि के अतरिक्त अन्य कमरे भी मिले है 

मजबूती के लिये नीव नर्माण की जाती थीसड़को के किनारे माकान बने थे जिनसे सुविधा हवा , सफाई , प्रकाश की पूर्ण व्यवस्या होती थी 

 मकान जमीन से ऊँचाई पर बनाये जाते थेमकानों के दरवाजे सड़को की ओर खुले रहते थेमकानों के प्रवेश द्वार मुख्य मार्ग की आपेक्षा गली की ओर खुले थेजिसके कारण बाहरी हलचल , शोरगुल एवं प्रदूषण से सुरक्षित रह होगा 

सड़को के किनारेकिनारे पानी की निकासी के लिए नालियाँ बनी होती थीनालियो को ढकने की व्यवस्था होती थी 

नालियो को फर्श से ढखा जाता थानालियो में थोड़ीथोड़ी दूर पर शोषक कूप लगे रहते थेजिनमें गंदगी रुकी रहती थीपक्की ईटो का प्रयोग बहुत अधिक मात्रा में किया जाता था 

 हड़प्पा सभ्यता में सार्वजनिक भवन :- 

सिंधु घाटी सभ्यता को दो भागों में विभाजित किया गयाजिसके ऊपरी हिस्से में सार्वजनिक भवननिचले हिस्से में व्यक्तिगत आवास बने हुए थे 

उत्खनन में सावर्जनिक या राज्यकीय भवनों के अवशेष मिले हैंएक अवशेष मोहनजोदड़ो से मिला हैजो 70 मीटर लम्बा और 24 मीटर चौडा हैयह इस्मार्क उस काल की संपन्नता का परिच्यक हैयहाँ पर ही 71 मीटर लंबा व इतना ही चौड़ा एक वर्गाकार कक्ष का अवशेष प्राप्त हुआ हैजिसमे 20 सतम्भ है 

एक अनुमान के अनुसार इस भवन का उपयोग आपसी विचार विमर्श धार्मिक आयोजन , सामाजिक आयोजन के लिए किया जाता होगा 

हड़प्पा सभ्यता में विशाल स्नानागार :- 

 स्नानागार का जलाशय किले में स्थित था । 11.88 मीटर लंबा 7.01 मीटर चौड़ा 2.43 मीटर गेहरा इसके तल पर सीढ़िया बनी हुई हैयह सीडिया पक्की ईटो से बनाई गई है 

स्नान कुड़ के चारो और कमरे बने हुए है और बराऊनदे भी बनाये गए हैस्नान कुंड के कमरे के समीप एक कुआ बना हुआ हैजिससे पानी कुंड में आता था और कुंड के गन्दे पानी की निकासी एक अन्य दरवाजे ( द्वार ) से की जाती थीगंदा पानी फिर बड़ी नालियो के माध्यम से शहर से बाहर निकल जाता 

स्नानागार की दीवारों के निर्माण में सीलन से बचने के लिए डावर या तारकोल का प्रयोग किया जाता थापूरे स्नानागार में 6 प्रवेश द्वार होते थेस्नानागार में गर्म पानी की व्यवस्था भी होती थी 

नोट :- इस स्नानागार के बारेे में अमेस्ट मैके कहते हैं कि यह स्नानागार प्रोहित के स्नान के लिये होता था 

अन्न भण्डार :- 

 हड़प्पा नगर के उत्खनन में यहाँ के किले के राजमार्ग मे 6-6 पक्तियो वाले अन्न भण्डार मिले हैअन्न भण्डार की लंबाई 18 मीटर चौड़ाई + 7 मीटर लम्बाई ( 18 x 7 ) इसका मुख्य द्वार नदी की और खुलता या क्योकि जो भी सामान जल मार्ग से आता था आन्न भण्डार मे एकत्रित किया जाता था 

हड़प्पा सभ्यता में जल निकास प्रणाली :- 

हड़प्पा संस्कृति नगरीय थीइन लोगो का जीवन स्तर उच्च थाघरो का गंदा पानी सड़को के किनारे बनी हुई नालियो से लेकर शहर के बाहर हो जाता थाइन नालियो में पक्की ईटो का प्रयोग किया जाता थाइनका पिलास्टर किया जाता थाजिससे नालियो को कोई नुकसानपहुंचे इसलिए पिलास्टर के लिए चुना , मिट्टी , जिप्सम का प्रयोग किया जाता था 

नोट :- प्रोफेसर रामचरण शर्मा की मान्यता है कि कंश युग की किसी भी दूसरी सभ्यता ने सफाईस्वास्थ को इतना महत्व नही दिया जितना हडप्पा देश के वासियो ने दिया 

नोट :- बहुतायत सेे पक्की ईटो का प्रयोग मुख्य रूप से चार प्रकार की ईटे प्रयुक्त की जाती थी 

 आयताकार = 4:2:1 

 L एल प्रकार की ईटे = इन ईटो का प्रयोग कोने में किया जाता था 

 नोकदार ईटे = इनका प्रयोग कुओ में किया जाता है 

T टी प्रकार की ईटो = इनका प्रयोग सीढ़ियों में किया जाता था 

 अलकृत ईटो से निर्मित फर्श कालीबंगा से मिला है 

ईटो पर बिल्ली का पीछा करते हुए कुत्ते के पंजे का निशान मिला हैयह चन्हूदड़ों सभ्यता से मिला है 

हड़प्पा सभ्यता में सामाजिक जीव  

  • सामाजिक संगठन 

  • भोजन 

  • वस्त्र 

  • आभूषणसौंदर्य प्रर्दशन 

  • मनोरजन 

  • प्रौद्योगिकी 

  • मृतक कर्म 

  • चिकित्सा विज्ञान 

हड़प्पा सभ्यता में सामाजिक सगठन :- 

इतिहासकार गार्नर चाइल्ड ने समाज को चार भागों में विभाजित किया है :- 

शिक्षित वर्ग :- प्रोहित , चिकित्सा , जादूगर , जोतिस 

 योद्धा / सैनिक :- इनकी पुष्टि दुर्गों में उपस्थिति के अवशेषों से मिले है 

व्यपारिदस्तक्षा :- बुनकर , कुमार , सुवर्णकर 

श्रमिक एवं कृषक :- टोकरी बनाने वाले , मछली मारने वाले 

हड़प्पा सभ्यता में भोजन :- 

 गेहूँ , चावल , जौ , तेल , मटर , सब्जियां वह मासाहारी भी थेकछुआ , गड़ियाल , भेड़ , बकरी , सुअरमछली का माँस इत्यादि खाते थे 

इस काल मे चित्रो में खजूर , अनार , तरबूज , नींबू , नारियल आदि के फलों का चित्रण किया जाता थावह इन फ़लो का उपयोग भोजन के रूप में करते थे 

इस प्रकार हड़प्पा वासी माँसाहारीशाकाहारी दोनों ही थे 

हड़प्पा सभ्यता में वस्त्र :- 

वह भिन्ननभिन्नन ऋतुओ में अलगअलग वस्त्र पहनते थेमहिला और पुरुष के वस्त्रों में भिन्नता पाई जाती थी 

 पुरुषो में धोती , पगड़ी , दशाले ( कुर्ता ) , एव महिलाओं में घागरा में साड़ी पहनती थी 

नोट :- चन्हूदड़ों से प्राप्त मूर्ति में पगड़ी मिली है 

हड़प्पा सभ्यता में आभूषण एव सौंदर्य प्रसाधन :- 

 स्त्रीपुरुष दोनों ही आभूषण पहनते थे । व दोनों ही सौंदर्य प्रसाधन के सामग्री का प्रयोग करते थेआँगूठी , कान की बाली , चुडिया , बाजू बंद , हार , धनी लोग हाथो में सोने जैसी कीमती धातू के आभूषण पहनते थेजबकि सामान्य लोग ताँबे , काँसा तथा हड्ड़ी के बने आभूषण पहनते थे 

हड़प्पा सभ्यता में मनोरंजन :- 

 मछली पकड़ना , शिकार करना उनका प्रिय मनोरंजन थाजानवरो की दौड़ , जुनझुने , सीटिया तथा शतरंज के खेल उनके मनोरंजन के साधन थे 

इसके अलावा पत्थर तथा सीप की गोलियों से खेल खेलते थेखुदाई में पशुओं की मूर्ति , बेल गाड़िया , दो पहिये वाला तांबे का रथ मिला हैनत्यागना कि मूर्ति भी मिली हैजिसमे पता चलता है कि हड़प्पावासी भी नाचगाना करते थे 

प्रौद्योगिकी :- 

 वे धातु कर्म का निर्माण करते थेअयस्कों से धातु अलग करते थेमिश्रित धातु का भी निर्माण करते थेताँवे में चांदीटिन मिलाकर काँसा बना लेते थेअश्यक की आपूर्ति राजस्थान प्रान्त के खेड़ी ( झुनझुनू ) व बिहार प्रान्त के हजारी बाग से करते थेचकमक पत्थर के बॉटनालिकाकार बम बनाते थे 

हड़प्पा सभ्यता में म्रतक कर्म ( अंत्योष्टि क्रिया ) :- 

 हड़प्पा कालीन नगरो ( मोहनजोदड़ो , बनावली , हडप्पा , कालीबंगा , ) आदि में शमसान के अवशेष मिले हैं 

 सर जॉन मार्शल के अनुसार इसे तीन भागो में विभाजित किया है 

  • 1 ) पूर्ण समाधिकरण / शवाधान 

  • 2 ) आंशिक समाधिकरण / शवाधान 

  • 3 ) दाह कर्म / क्लेश शवाधान 

 पूर्ण शवाधान :- 

 शव को उत्तर से लेकर दक्षिण की ओर दफनाया जाता था 

नोट :- हडप्पा में एक कब्र ऐसी मिली है जिसे दक्षिण से उत्तर की ओर दफनाया गया हैऔर सबको दाबूत में रखा गया हैइसकी पहचान विशेष कब्र से की गई हैं 

नोट :- लोथल में पूर्व से पश्चिम की ओर दफनाने का अवशेष मिला हैतथा शव करवट के रूप में हैं 

नोट :- लोथल से ही युग्म शव ( स्त्री , पुरुष ) मिला हैइससे पता चलता है कि उस समय सती प्रथा प्रचलित थी 

 सबसे बड़ा कबरिस्तान हडप्पा से मिला है जिसे R37 की संज्ञा दी गई है 

 हडप्पा संस्कृति में एक ओर कब्रिस्तान मिला है जिसे H कब्रिस्तान की संज्ञा दी गयी है 

 आंशिक शवाधान :- 

 शव को पशुपक्षियों द्वारा खाने के बाद बचे हुए अवशेषों को दफना देना 

 क्लेश शवाधान / दाह कर्म :- 

 दाह के पश्चात बचे हुए अवशेष को किसी कलश या मंजूषा ( बर्तन ) में रखकर दफना देना 

 हड़प्पा सभ्यता में चिकित्सा विज्ञान :- 

 जड़ीबूटी , फल , वृक्षों के पत्त्ते , विशिष्ट प्रजाति के वृक्षों के फूल , रस का सेवन करते थेहिरणो के सींगो से चूर्ण बनाया जाता थासमुद्र के फेन ( झांग ) से भी औषधि बनाई जाती थीशिलाजीत भी पाई जाती थी 

 हड़प्पा सभ्यता में आर्थिक जीवन  

  • 1 ) कृषि 

  • 2 ) पशुपालन 

  • 3 ) व्यपार 

  • 4 ) कुटीर उद्योग 

  • 5 ) माप तोल के बाट 

 कृषि :- 

 जौ , गेहूँ , मटर , खजूर ,कपास , तरबूज , तिल , राई , सरसो जैसे फसले उगाई जाती थीइनका उत्पादन फावड़े से तो नही मिलालेकिन हल के अवशेष कालीबंगा से मिले हैंफसल को पाषण के काटने के लिये हासिये का प्रयोग किया जाता था 

 आनाज को धोने के लिए दो पाहिये वाली गाड़ी का प्रयोग किया जाता थाबैल सिंधु सभय्ता का सबसे प्रमुख पशु था 

 पशुपालन :- 

 बकरी , भेड़ , सुअर , भैस , बैल , पालते थे बैल के रूप में सांड प्रमुख पशु थाइसके अतिरिक्त हाथी ओर पाले जाते थेकिंतु घोड़े से वो परिचित नही थेवे कुत्तो और बिल्ली पालते थेसाथ ही तोता , मयूर मूंगे , भालू , चीता , खरगोश , बत्तख , हिरण आदि के चित्र उनकी मूर्तियों के चित्रों में अंकित हैपरंतु अवशेष नही है 

 व्यपार :- 

 हड़प्पा के लोग व्यपार को अधिक महत्व देते थे 

 नाप के लिए शीशे की पटरी का प्रयोग करते थे 

 चन्हुदड़ो में उत्खनन से प्राप्त पत्थरों के एक वाट का प्रयोग कारखाना मिला है 

 समाज मे अनेक व्यापारिक वर्गों के लिए रहते थेजिनका कार्य केवल व्यपार या व्यवसाय से होता थाइनमे कुमार , बढई , सुनार आदि प्रमुख थे 

 आर्थिक व्यपार के अतरिक्त इनका ईरान , अफगानिस्तान , मेसोपोटामिया , इराक के साथ व्यपारिक सम्बंध थे 

 अतरिक्त व्यपार वस्तु विलियम के माध्यम से जिनकी बाहरी व्यपार मोहरो से किया जाता थादूर देशो में जहाज रानी का प्रयोग किया करते थे 

 कुटीर उद्योग :- 

 कुमारो के द्वारा चाक से निर्मित मिट्टी की मूर्तियां , खिलोने , बर्तन के अतिरिक्त ईटो का निर्माण भी बड़े पैमाने पर किया जाता था 

 इस काल मे हाथी दाँत , सीपियों धातु के विभिन्न आभूषण बनाये जाते 

 माप तोल वाट :- 

 तोल के लिए तराज़ूवाट सम्मिलित थेचिकने पत्थर से वाट का निर्माण किया जाता था ( चर्ट ) नामक पत्थर से वाट का निर्माण किया जाता थासबसे बड़े वाट का वजन 375 ग्राम था सबसे छोटे का वजन 0.87 ग्राम था 

 हड़प्पा सभ्यता में धार्मिक जीवन  

  • मात्र देवी की उपासना 

  • शिव या परम पुरुष की आराधना 

  • वृक्ष ओर पशु पूजा 

  • लिंग पूजा 

 मात्र देवी की पूजा या उपासना :- 

 हड़प्पा संस्कृति में मन्दिरो का अभाव थाउत्खनन में ऐसा कोई भवन प्राप्त नही हुआ जिसे देवालय की संज्ञा दी जा सकेइस काल मे मिट्टी तथा धातु की अनेक नग्न नारी की मूर्तियां मिली है 

 मात्र देवी के अनेक चित्र ताबीजों में मिट्टी के बर्तनों में तथा मोहरो में अंकित हैइसमें यह पता चलता है कि यहाँ पर मात्र देवी की उपासना की जाती है 

नोट :- प्रो आर एस त्रिपाठी की मान्यता है कि पूजा के क्षेत्र में सर्वाधिक प्रतिष्ठा मात्र शक्ति की थीजिसकी अराजना प्रचीन काल से ईरान से लेकर इंजियन सागर तक के सारे देश मे होते थे 

 मात्र देवी श्रिष्टि की उत्पत्तिवनस्पति के फैलाव में देवी का योगदान स्वीकार किया गया है 

 इस समय मात्र देवी को प्रसनन करने के लिए बलि प्रथा का प्रचलन थापूजा , आराधना , नृत्य , संगीत बली देकर की जाती थीइस काल मे मन्दिरो के अवशेष नही मिले हैं 

 शिव या परमपुरुष की उपासना :- 

 उत्खनन में अर्नेष्ट मैके को एक ऐसी मुद्रा मिली जिस पर पुरुष के चित्र में शिर के दोनों और सींघ हैइस योगी के तीन मुख हैसांतगम्भीर मुद्रा में हैइसके वायी ओर जंगली भैसा और गेड़ा जबकि दायीं ओर शेर ओर हाथी हैसामने हिरण है इस ध्यानमग्न योगी के सिर के ऊपर पाँच शब्द लिखे हुए हैजिन्हें अब तक पढ़ा नही जा सका है । ( परम पुरुष के रूप में पशुपति शिव की आराधना ) 

 वृक्ष और पशु पूजा :- 

 अनेक मोहोरो में पीपल तथा उसकी पत्तियों के चित्रों का अंकन हैजिसमे ऐसा लगता हैं कि वह लोग वृक्ष पूजा के अंतर्गत पीपल की पूजा करते थे वर्तमान में भी पीपल की वृक्ष पूजा की जाती हैइनके अतिरिक्त अनेक मोहोरो पर सांड औऱ बैल चित्रित अंकित है 

 वर्तमान में शिव भगवान के साथ सांड ( नन्दी ) की पूजा पूरे भारत वर्ष में कई जाती है 

 लिंग पूजा :- 

 उत्खनन में लिंग पूजा प्रस्तर ( पत्थर ) के लिंग मिले है इससे अनुमान लगाया जाता है कि लिंग पूजा का प्रचलन हड़प्पा संस्कृति में थाइनमे से कुछ लिंगो के शीर्ष गोल आकृति नोकदार कुछ लिंग एक या दो इंच के कुछ तो चार फीट के भी मिले हैस्वाष्टिक चिन्ह एव क्रास तथा पिलस हड़प्पा काल के पवित्र चिन्ह हैजो आज भी पवित्र माने जाते हैं 

 हड़प्पा सभ्यता में राजनीति जीवन :- 

यहाँ पर रानीतिक जीवनराजनीतिक व्यवस्था की जानकारी बहुत कम मिलती हैइतिहासकार हनटर की मान्यता है कि मोहनजोदड़ो में शासन व्यवस्था लोकतंत्रात्मक थी वह राजतंत्रात्मक नही थी 

 इतिहासकार व्हीलर की मान्यता है कि मोहनजोदड़ो का शासन व्यवस्था पुरोहितोधर्मगुरु के हाथों में थी 

 वे जनप्रतिनिधियों के माध्यम से शासन करते थेनगर निर्माणभवन निर्माण को देखकर ऐसा लगता है की वहाँ पर नगर पालिका रही होगी 

 हड़प्पा सभ्यता में कला का विकास  

  • मूर्तिकला 

  • धातुकला 

  • वस्त्र निर्माण कला 

  • चित्रकला 

  • पात्र निर्माण कला 

  • नित्य तथा संगीत कला 

  • मुद्रा कला 

  • ताम्र निर्माण कला 

  • लेखन कला 

 मूर्तिकला :- 

 उत्खनन में प्राप्त पत्थर की मूर्तियां कांसे की मूर्तियां इसमे अंगों की छलक दिखाई गई हैएक नृतकी की मूर्ति बहुत ही सुंदरआकर्षक है इन मूर्तियों में गाल की हड्ड़ी बहुत ही सुंदरआकर्षक है आँखे तिरछीपतली है गर्दन छोटीपतली है 

 धातुकला :- 

 सोना , चाँदी , ताँबा , आदि के आभूषण मिले हैं 

 वस्त्र निर्माण कला :- 

 उत्खनन में चरखा मिला हैजिससे पता चलता है की सूत काटने का काम में वहाँ के लोग निपुण थेसूती , ऊनी , रेशम वस्त्र पहनते थे 

 चित्रकला :- 

 मोहोरो पर साँड़ के चित्र , भैसे के चित्र , वृक्ष के चित्र इसका मतलब वो लोग चित्रकला में निपुण थे 

 पात्रनिर्माण कला :- 

 मिट्टी के पात्र बनाने में , पानी भरने के लिए तरहतरह के घड़े , अनाज रखने के लिए छोटे अनेक प्रकार के भाण्ड , मिट्टी के खिलौने इसका मतलब वो पात्रनिर्माण कला में निपुण थे 

 नृत्य तथा संगीत कला :- 

 नृत्यांगना की मूर्ति मिली है पात्रो पर तलवे तथा ढोलक के चित्र मिलते हैं 

 मुद्रा कला :- 

 उत्खनन में भिन्नभिन्न प्रकार के पत्थरो , धातुओं तथा हाथी दाँतमिट्टी की 600 मोहरे मिली हैजिन पर एक ओर पशुओं के चित्र ओर दूसरी ओर लेख मिले है 

 ताम्र निर्माण कला :- 

 उत्खनन में अनेक ताम्र पत्र मिले हैं जो वर्गाकारआयताकार के हैइनमे पशुओंमनुष्य के चित्र मिले हैंपशुओं में बैल , भैसा , गेड़ा , सांड , हाथी , शेर आदि मनुष्य में योगी के चित्र मिले हैं 

 लेखन कला :- 

 उत्खनन कोई भी लिखित शिलालेख या ताम्रपत्र नही मिला हैलेकिन फिर भी विद्वानों में मतभेद है ( लिपि में के बारे में यह लिपि चित्रतात्मक थीतथा दाये से बाएबाए से दाये दोनों ओर लिखी जाती थी 

 निर्वाह के तरीके ( कृषि , शिल्पकला , व्यापार ) :- 

 गुजरात से बाजरे के दाने मिले हैंचावल के दाने कम मिले है 

 बनावली ( हरियाणा ) से मिट्टी के हल के खिलौने मिले हैं 

 कालीबंगा नामक सभ्यता से जूते हुए खेत का साक्ष्य मिला हैइस खेत मे हल रेखाओ के द्वारा एकदूसरे को समकोण पर काटते हुए दिखाया गया हैइससे यह पता चलता है कि एक साथ दो दो फैसले उगाई जाती थी 

 आधिकांश हड़प्पा स्थल अर्धशुष्क क्षेत्रों में स्थित थेजहाँ के लिए सिचाई की आवश्यकता पड़ती होगी 

हड़प्पा वासी कपास का भी प्रयोग करते थेमोहनजोदड़ो से कपड़ो के टुकड़ों के अवशेष मिले हैं 

 विलासिता की खोज :- 

 फयान्स ( घिसी हुई रेत , अथवा बालू तथा रंग और चिपचिपे पर्दाथ के मिश्रण को पकाकर बनाया गया पदार्थ ) के छोटे पात्र सम्भवतः कीमती थेक्योकि इन्हें बनाना कठिन था 

 सुगंधित प्रदार्थो के रूप में बने लघुपात्र मोहनजोदड़ो ओर हडप्पा से मिले हैं 

 सोना भी दुर्लभ तथा संभवतः आज की तरह कीमती थाहड़प्पा स्थलो से मिले सभी स्वर्णभूषण संचयो से प्राप्त हुए हैं 

 मोहरो का आदानप्रदान :- 

 सिंधु सभ्यता की मोहरे उर , सुमेर , क्रिश , उम्मा , तेलुअस्मार , बहरीन , आदि से मिली है 

 मेसोपोटामिया की मोहरे मोहनजोदड़ो तथा फारस की मोहरे लोथल से मिली है । ( वस्तु का आदान प्रदान की पुष्टि ) 

 जॉन मार्शल को मोहनजोदड़ो से एक ऐसी मोहर मिली है जिस पर एक व्यक्ति को बाघ से लड़ते हुए दिखाया गया है 

 जॉन मार्शल के अनुसार यह विचार बेबिलोनिया के महाकव्य गिलगिमेश से लिया गया है 

 लोथल से प्राप्त गोड़ीबाड़ा के अवशेष मोहर पर जहाज का चित्र तथा मिट्टी के जहाज का नाम नमूना था 

 मृदभाण्ड :- 

 यहा के मृदभाण्ड मुख्यतः गाढी लला चिकनी मिट्टी से निर्मित हैजिन पर काले रंग का चित्रण हैमुख्यत : ज्यामितीय चित्रण 

 लोथल से एक ऐसा मृदभाण्ड मिला है जिस पर चित्रित चित्र का समीकरण पंचतंत्र की कहानी चालक लोमड़ी से किया गया है 

हड़प्पा से प्राप्त एक मृदभाण्ड पर मानव और बच्चे का चित्र मिला हैडिजाइनदार मृदभाण्ड भी मिले हैंजिसमे अलगअलग रंगों का भी प्रयोग किया गया हैइनको सजावट के लिए प्रयोग किया जाता था 

 कलात्मक अवशेष :- 

  • हड़प्पा से प्राप्त काले पत्थर से निर्मित नृतक की मूर्ति नटराज नृत्य की मुद्रा में 

  • हड़प्पा से भी प्राप्त सिविहिनी मानव की मूर्ति 

  • मोहनजोदड़ो से प्राप्त सिरविहिनी मानव मूर्ति 

  • मोहनजोदड़ो से प्राप्त कास्य नृतकी 

 हड़प्पाई लिपि की विशेषताएँ :- 

  • यह लिपि दाईं से बाए ओर लिखी जाती थी | 

  • यह लिपि चित्रात्मक लिपि थी | 

  • इस लिपि में 375 – 400 चिन्ह थे | 

  • इस लिपि को आजतक कोई समझ नहीं पाया 

  • यह एक रहस्यमई लिपि है | 

  • इसी के कारण हडप्पा सभ्यता के बारे में हमे ज्यादा जानकारी नही मिल सकी क्योकि हडप्पा की लिपि को आजतक विद्वान् समझ नही पाए 

 हडप्पा सभ्यता में शिल्पकला :- 

  • शिल्प कार्य का अर्थ होता है शिल्प से जुड़े कार्य करना जैसे :- 

  • मनके बनाना 

  • शंख की कटाई करना 

  • धातु से जुड़े काम करना 

  • मुहरे बनाना 

  • बाट बनाना 

  • चन्हुदड़ो ऐसी जगह थी जहाँ के लोग लगभग पूरी तरह से शिल्पउत्पादन के कार्य करते थे | 

  • चन्हुदड़ो में कुछ ऐसी चीज़े मिली है जिससे पता लगता है की यहाँ पर शिल्प उत्पादन बडे पैमाने पर होता था 

  • हड़प्पाई मोहरे काफी मात्रा में पाई गई है 

  • हड़प्पाई लोग कांसे का प्रयोग करते थे 

  • काँसा तांबा और टिन को मिलाकर बनाई गई एक मिश्रधातु है 

 हडप्पा सभ्यता में मनके कैसे बनाए जाते थे ? 

  • मनके सेलखड़ी नामक पत्थर से बनाये जाते थे 

  • मनके कर्निलियन नामक पत्थर से भी बनाये जाते थे | 

  • मनके जैसपर नमक पत्थर से भी बनाये जाते थे | 

  • मनके ताबे के भी बनाये जाते थे 

  • मनके सोने के भी बनाये जाते थे 

  • मनके कांसे के भी बनाये जाते थे 

  • इन मनको का प्रयोग मालाओ में किया जाता था तथा यह बहुत सुंदर होते थे 

  • मनके हड़प्पा सभ्यता की एक मुख्य सभ्यता है 

 कनिंघम :- 

 कनिंघम भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग का पहला डायरेक्टर जनरल था| अलेक्जेंडर कनिंघम को भारतीय पुरातत्व का जनक भी कहा जाता है| 

 कनिंघम ने 19वीं शताब्दी के मध्य में पुरातात्विक खनन आरंभ किया| यह लिखित स्रोतों का प्रयोग अधिक पसंद करते थे| 

 कनिंघम का भ्रम :- 

  • कनिंघम ने अपने सर्वेक्षण के दौरान मिले अभिलेखों का संग्रहण पर लेखन तथा अनुवाद भी किया 

  • हड़प्पा वस्तुएं 19वीं शताब्दी में कभी कभी मिलती थी और कनिंघम तक पहुंची भी 

  • एक अंग्रेज ने कनिंघम को हड़प्पा में पाई गयी एक मुहर दी 

  • अलेक्जेंडर कनिंघम को एक अंग्रेज अधिकारी ने जब हड़प्पाई मुहर दिखाई तो कनिंघम यह नहीं समझ पाए कि वह मुहर कितनी पुरानी थी 

  • कनिंघम ने उस मुहर को उस कालखंड से जोड़कर बताया जिसके बारे में उन्हें जानकारी थी 

  • वे उसके महत्व को समझ ही नहीं पाए कि वह मुहर कितनी प्राचीन थी 

  • कनिंघम ने यह सोचा कि यह मुहर भारतीय इतिहास का प्रारंभ गंगा घाटी में पनपे पहले शहरों से संबंधित है जबकि यह मुहर गंगा घाटी के शहरों से भी पहले की थी 

 हड़प्पा सभय्ता के पतन के कारण :- 

  • जल वायु परिवर्तन 

  • प्राकृतिक आपदा 

  • भूकंप 

  • आकाल 

  • महामारी 

  • बाहरी आक्रमण ( आर्य जाति के आक्रमण ). 

  • वनों की कटाई 

  • नदियों का सूखना 

  • नदियों का मार्ग बदल जाना 

  • बाढो का आना ( दामोदर , कोसी , महानदी ) बाढ़ की प्रसिद्ध नदी 

नोट :- पिंगट एवं व्हीलर आर्य जाति के आक्रमण ऋग्वेद ( सबसे प्राचीन वेद ) में आर्यो द्वारा हरियूषिया को नष्ट करने का उल्लेख है 

  • वैदिक साहित्य में हड़प्पा को हरियूषिया कहा जाता है 

  • सर जॉन मार्शल , अर्नेष्ट मैर्के , SR राव इनके अनुसार नदियों में आने वाली बाढ़ का अनुमान 

  • अल्मानन्द घोष , डी पी अग्रवाल के अनुसार जलवायु परिवर्तन 


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